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त्योहार

कृष्ण जन्माष्टमी 2026: तारीख, पूजा मुहूर्त, व्रत और कथा

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 शुक्रवार, 4 सितंबर को है। जानें अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, निशीथ पूजा समय, पारण, पूजा विधि और श्रीकृष्ण जन्म कथा।

Parashar Hora Editorial12 min read2 अगस्त 2026
कृष्ण जन्माष्टमी 2026: तारीख, पूजा मुहूर्त, व्रत, जन्म कथा और आध्यात्मिक महत्व

कृष्ण जन्माष्टमी 2026

कृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।

यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है। उनका जन्म मथुरा के कारागार में माता देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में हुआ माना जाता है।

उस समय चारों ओर भय था। माता-पिता बंदी थे, कंस सत्ता में था और भविष्य अनिश्चित दिखाई देता था।

फिर भी उसी अंधकार में कृष्ण का जन्म हुआ।

इसी कारण जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक जन्मोत्सव नहीं है। यह उस आशा का पर्व है जो सबसे कठिन परिस्थिति में भी जन्म ले सकती है।

जन्माष्टमी 2026 एक नजर में

विवरणनई दिल्ली का समय
जन्माष्टमी4 सितंबर 2026, शुक्रवार
अष्टमी तिथि प्रारंभसुबह 2:25 बजे
अष्टमी तिथि समाप्त5 सितंबर को रात 12:13 बजे
रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ4 सितंबर को रात 12:29 बजे
रोहिणी नक्षत्र समाप्तरात 11:04 बजे
निशीथ पूजारात 11:57 से 12:43 बजे तक
मध्यरात्रि क्षण5 सितंबर को रात 12:20 बजे
धर्मशास्त्र के अनुसार पारण5 सितंबर को सुबह 6:01 बजे के बाद
प्रचलित आधुनिक पारणरात 12:43 बजे के बाद
दही हांडी और नंदोत्सव5 सितंबर 2026

ये समय नई दिल्ली के अनुसार हैं। शहर बदलने पर निशीथ काल, सूर्योदय, चंद्रोदय और पारण का समय बदल सकता है।

जन्माष्टमी आधी रात को क्यों मनाई जाती है?

जन्माष्टमी कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है।

परंपरा के अनुसार भगवान कृष्ण का प्राकट्य रात्रि के गहरे अंधकार में हुआ था। इसलिए मुख्य जन्म पूजा निशीथ काल में की जाती है।

आधी रात को मंदिरों में घंटियां बजती हैं, शंख ध्वनि होती है, भजन गाए जाते हैं और बाल कृष्ण का स्वागत किया जाता है।

इस रात्रि का अंधकार केवल समय का संकेत नहीं है।

यह उस परिस्थिति का भी प्रतीक है जिसमें देवकी और वसुदेव थे—बंदी, भयभीत और भविष्य को लेकर अनिश्चित।

फिर भी उसी स्थान पर आशा ने जन्म लिया।

जन्माष्टमी हमें याद दिलाती है कि हमारे आसपास का अंधकार यह तय नहीं कर सकता कि हमारे भीतर क्या जन्म लेगा।

श्रीकृष्ण जन्म की कथा

मथुरा पर कंस का शासन था।

भविष्यवाणी हुई कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र उसके अत्याचार का अंत करेगा। यह सुनकर कंस ने अपने व्यवहार को सुधारने के बजाय भविष्य को बलपूर्वक नियंत्रित करने का प्रयास किया।

उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया।

आठवें पुत्र के जन्म की रात्रि आने पर भगवान कृष्ण ने देवकी और वसुदेव के सामने प्रकट होकर बालक का रूप धारण किया।

कारागार के पहरेदार सो गए, बंद द्वार खुल गए और वसुदेव की बेड़ियां मुक्त हो गईं।

वसुदेव नवजात कृष्ण को टोकरी में लेकर मथुरा से गोकुल की ओर चले। यमुना पार करके उन्होंने बालक को नंद और यशोदा के घर सुरक्षित पहुंचाया।

इसके बाद वे वापस कारागार लौट आए।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में कृष्ण के प्राकट्य, रोहिणी नक्षत्र, कारागार के द्वार खुलने और वसुदेव द्वारा बालक को गोकुल ले जाने का वर्णन मिलता है।

यह कथा केवल चमत्कारों की कथा नहीं है।

यह माता-पिता के साहस, बच्चे की रक्षा, संकट के बीच सही निर्णय और भविष्य के प्रति विश्वास की कथा भी है।

कृष्ण जन्म का गहरा अर्थ

अंधकार में आशा

कृष्ण का जन्म किसी सुरक्षित राजमहल में नहीं हुआ।

कारागार उन्हें आने से रोक नहीं सका। इसका अर्थ यह नहीं कि दुख वास्तविक नहीं है। इसका अर्थ है कि दुख की शक्ति असीम नहीं है।

भय और अधर्म का अंतर

कंस की सबसे बड़ी समस्या केवल क्रूरता नहीं थी। वह अपने भय का दास बन गया था।

उसने भविष्यवाणी से बचने के लिए वर्तमान में अन्याय करना शुरू कर दिया।

कृष्ण की कथा हमें सिखाती है कि भय के आधार पर लिए गए निर्णय मनुष्य को उसी परिणाम की ओर धकेल सकते हैं जिससे वह बचना चाहता है।

धर्मपूर्ण कर्म

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा और अधर्म की वृद्धि होने पर दिव्य प्राकट्य की बात करते हैं।

धर्म का अर्थ केवल अनुष्ठान नहीं है।

धर्म में शामिल है:

  • सही और गलत को पहचानना;
  • जिम्मेदारी स्वीकार करना;
  • अन्याय के सामने विवेकपूर्ण साहस रखना;
  • शक्ति का दुरुपयोग न करना;
  • अपने कर्म के परिणामों को समझना।

प्रेम के अनेक रूप

कृष्ण देवकी के पुत्र हैं, यशोदा के लाडले हैं, अर्जुन के मार्गदर्शक हैं और सुदामा के मित्र हैं।

इसी कारण कृष्ण भक्ति अत्यंत व्यक्तिगत अनुभव बन जाती है।

कोई उन्हें ईश्वर मानकर पूजता है, कोई बालक समझकर प्रेम करता है, कोई मित्र और कोई जीवन का मार्गदर्शक मानता है।

जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है?

मथुरा और वृंदावन जन्माष्टमी के प्रमुख केंद्र हैं। यहां मंदिरों में विशेष दर्शन, भजन, कथा, रासलीला और मध्यरात्रि जन्मोत्सव आयोजित होते हैं।

घर और मंदिरों में सामान्यतः:

  • व्रत रखा जाता है;
  • पूजा स्थान सजाया जाता है;
  • बाल गोपाल का अभिषेक किया जाता है;
  • भजन और कीर्तन होते हैं;
  • भगवद्गीता या भागवत का पाठ होता है;
  • कृष्ण को पालने में झुलाया जाता है;
  • घर में छोटे चरण चिह्न बनाए जाते हैं;
  • प्रसाद तैयार किया जाता है;
  • रात में जन्म आरती होती है;
  • अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है।

महाराष्ट्र और कुछ पश्चिमी क्षेत्रों में अगले दिन दही हांडी का आयोजन होता है। यह कृष्ण और उनके साथियों की माखन तक पहुंचने वाली बाल लीलाओं से जुड़ी परंपरा है।

दही हांडी केवल उचित सुरक्षा व्यवस्था वाले संगठित कार्यक्रम में होनी चाहिए। बच्चों को बिना प्रशिक्षित वयस्कों और सुरक्षा के ऊंचे मानव पिरामिड या जोखिमपूर्ण गतिविधियां नहीं करनी चाहिए।

घर पर सरल जन्माष्टमी पूजा विधि

1. पूजा स्थान साफ करें

पूजा का स्थान साफ करके बाल कृष्ण का चित्र या प्रतिमा सम्मानपूर्वक स्थापित करें।

उपलब्ध फूल, पत्ते और सामान्य सजावट पर्याप्त है।

2. संकल्प लें

एक सरल संकल्प हो सकता है:

जन्माष्टमी के अवसर पर मैं विवेक, भक्ति और धर्मपूर्ण आचरण विकसित करने का प्रयास करूंगा।

3. सुरक्षित स्थान पर दीपक जलाएं

दीपक को पर्दों, बच्चों और पालतू पशुओं से दूर स्थिर स्थान पर रखें।

4. जल और पूजन सामग्री अर्पित करें

श्रीकृष्ण को स्वच्छ जल, फूल, तुलसी दल, फल और सरल प्रसाद अर्पित किया जा सकता है।

पारिवारिक परंपरा के अनुसार दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक किया जा सकता है। सामग्री की बड़ी मात्रा आवश्यक नहीं है।

5. मंत्र जप करें

सरल मंत्र:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

अपनी परंपरा के अनुसार हरे कृष्ण महामंत्र का जप भी किया जा सकता है।

6. जन्म कथा पढ़ें

कृष्ण जन्म की कथा पढ़ें या अपने शब्दों में परिवार को सुनाएं।

बच्चों के साथ इन प्रश्नों पर चर्चा की जा सकती है:

  • कंस भय के कारण गलत निर्णय क्यों लेने लगा?
  • वसुदेव को साहस कहां से मिला?
  • यशोदा का प्रेम क्यों महत्वपूर्ण था?
  • बुद्धि का उपयोग दूसरों की रक्षा में कैसे किया जा सकता है?

7. निशीथ काल में जन्म पूजा करें

निशीथ काल में आरती, भजन और प्रार्थना करें।

पारिवारिक परंपरा के अनुसार बाल कृष्ण को पालने में झुलाया जा सकता है।

8. प्रसाद वितरित करें

पूजा के बाद प्रसाद बांटें।

व्रत रखने वाले व्यक्ति पारण अपने परिवार, मंदिर या संप्रदाय की परंपरा के अनुसार करें।

जन्माष्टमी व्रत कैसे रखें?

व्रत की पद्धति परिवार और स्वास्थ्य के अनुसार अलग हो सकती है।

भक्त इनमें से कोई तरीका अपना सकते हैं:

  • पूर्ण उपवास;
  • फल और जल;
  • दूध तथा फल;
  • अनाज-रहित भोजन;
  • एक समय सरल भोजन;
  • स्वास्थ्य के अनुसार बदला हुआ व्रत।

सामान्य व्रत आहार में परिवार की परंपरा के अनुसार फल, मेवे, दूध, दही, मखाना, आलू, शकरकंद, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा और सेंधा नमक शामिल हो सकते हैं।

व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं है।

बच्चों और किशोरों को माता-पिता या अभिभावक की जानकारी और सहायता के बिना कठोर व्रत नहीं रखना चाहिए। गर्भवती महिलाएं, दवा लेने वाले लोग, मधुमेह या अन्य स्वास्थ्य समस्या वाले व्यक्ति चिकित्सकीय मार्गदर्शन के अनुसार व्रत करें।

जो व्रत नहीं रख सकता, वह प्रार्थना, मंत्र, सरल भोजन, दान और अच्छे आचरण से जन्माष्टमी मना सकता है।

जन्माष्टमी व्रत का पारण कब करें?

नई दिल्ली के लिए धर्मशास्त्रीय पारण 5 सितंबर को सुबह 6:01 बजे के बाद दिया गया है।

कई स्थानों पर प्रचलित आधुनिक परंपरा में निशीथ पूजा पूरी होने के बाद, लगभग रात 12:43 बजे के बाद, व्रत खोला जाता है।

परिवार, मंदिर और वैष्णव संप्रदाय के नियम अलग हो सकते हैं। स्थानीय तिथि, सूर्योदय और पारण समय के लिए दैनिक पंचांग देखें।

इसलिए लेख में यह लिखना अधिक सही होगा:

जन्माष्टमी का पारण अपने परिवार, मंदिर या संप्रदाय की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार करें।

श्रीकृष्ण को क्या भोग लगाएं?

सामान्यतः अर्पित किया जाता है:

  • तुलसी दल;
  • माखन-मिश्री;
  • फल;
  • दूध से बनी मिठाइयां;
  • पंजीरी;
  • खीर;
  • सूखे मेवे;
  • पंचामृत;
  • घर का बना सात्त्विक भोजन।

कुछ मंदिरों में छप्पन भोग की परंपरा होती है, लेकिन घर में बड़ी संख्या में व्यंजन बनाना आवश्यक नहीं है।

श्रद्धा से अर्पित थोड़ा-सा फल भी पर्याप्त हो सकता है।

भोग की कीमत से अधिक महत्वपूर्ण उसके पीछे का प्रेम और ईमानदारी है।

बच्चों के लिए जन्माष्टमी को अर्थपूर्ण कैसे बनाएं?

बच्चों को बाल कृष्ण की कहानियां स्वाभाविक रूप से आकर्षित करती हैं।

जन्माष्टमी को केवल पोशाक और फोटो तक सीमित करने के बजाय परिवार:

  • बड़े बच्चों के साथ कृष्ण की शिक्षाओं पर बात करते समय जन्म कुंडली में चंद्र राशि या परिवार की कुंडली देख सकता है;
  • मिलकर छोटी झांकी बना सकता है;
  • एक कृष्ण कथा पढ़ सकता है;
  • सरल प्रसाद बना सकता है;
  • भजन गा सकता है;
  • चरण चिह्न बना सकता है;
  • किसी जरूरतमंद को भोजन या शिक्षा सामग्री दे सकता है;
  • भगवद्गीता की एक सीख को जीवन में अपनाने का संकल्प ले सकता है।

उद्देश्य केवल बच्चे को कुछ समय के लिए कृष्ण जैसा सजाना नहीं है।

गहरा उद्देश्य उसमें साहस, मित्रता, जिम्मेदारी और करुणा विकसित करना है।

जन्माष्टमी पर होने वाली सामान्य गलतियां

सजावट को भक्ति का माप बनाना

सुंदर सजावट प्रेम व्यक्त कर सकती है, लेकिन इसके लिए क्षमता से अधिक खर्च करना आवश्यक नहीं है।

दूध और भोजन की बर्बादी

अभिषेक और भोग की सामग्री को सम्मानपूर्वक उपयोग करना चाहिए।

किसी पर कठोर व्रत थोपना

स्वास्थ्य खराब करने वाला या इच्छा के विरुद्ध कराया गया व्रत अधिक आध्यात्मिक नहीं हो जाता।

एक शहर का समय पूरे देश में लागू करना

दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु में निशीथ पूजा का समय अलग होता है। शहर के अनुसार राहु काल और होरा चक्र भी बदल सकते हैं।

कृष्ण को केवल बाल लीलाओं तक सीमित करना

माखन, बांसुरी और वृंदावन कृष्ण भक्ति के सुंदर पक्ष हैं, लेकिन कृष्ण भगवद्गीता के शिक्षक और धर्मपूर्ण कर्म के मार्गदर्शक भी हैं।

भय फैलाना

यह दावा नहीं करना चाहिए कि कोई एक पूजा छूट जाने से निश्चित दुर्भाग्य आएगा।

भक्ति प्रेम से बढ़ती है, भय से नहीं।

जन्माष्टमी का वास्तविक संदेश

कृष्ण बंद दरवाजों के पीछे जन्म लेते हैं, लेकिन उनका आगमन दरवाजे खोल देता है।

उन्हें तूफान के बीच ले जाया जाता है, लेकिन वे शांति का संदेश बनते हैं।

उनका जन्म ऐसे राजा के शासन में होता है जो भविष्य को नियंत्रित करना चाहता है, लेकिन कृष्ण की कथा दिखाती है कि भय हमेशा सत्य को नियंत्रित नहीं कर सकता।

हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई आंतरिक कारागार हो सकता है:

  • असफलता का डर;
  • लोगों की स्वीकृति पर निर्भरता;
  • पुराना क्रोध;
  • बीते समय का अपराधबोध;
  • भविष्य की चिंता;
  • यह विश्वास कि अब कुछ नहीं बदल सकता।

जन्माष्टमी यह वादा नहीं करती कि सभी कठिनाइयां एक ही रात में समाप्त हो जाएंगी।

वह एक शांत विश्वास देती है:

नया जीवन तब भी आरंभ हो सकता है, जब हमारे आसपास के सभी दरवाजे अभी खुले न हों।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है?

कृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को है।

जन्माष्टमी की पूजा का समय क्या है?

नई दिल्ली में निशीथ पूजा लगभग रात 11:57 से 5 सितंबर की रात 12:43 बजे तक होगी।

अष्टमी तिथि कब से कब तक है?

अष्टमी तिथि 4 सितंबर को सुबह 2:25 बजे शुरू होकर 5 सितंबर को रात 12:13 बजे समाप्त होगी।

रोहिणी नक्षत्र कब है?

रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को रात 12:29 बजे शुरू होकर रात 11:04 बजे समाप्त होगा।

दही हांडी 2026 कब है?

दही हांडी सामान्यतः शनिवार, 5 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।

क्या जन्माष्टमी का व्रत अनिवार्य है?

नहीं। व्रत स्वैच्छिक है और स्वास्थ्य, आयु तथा पारिवारिक परंपरा के अनुसार रखा जाना चाहिए।

क्या घर पर जन्माष्टमी पूजा कर सकते हैं?

हां। जल, फूल, फल, मंत्र, प्रार्थना और कृष्ण जन्म कथा के साथ सरल पूजा की जा सकती है।

जन्माष्टमी पर कौन-सा मंत्र जपें?

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय सरल और प्रचलित कृष्ण मंत्र है।


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